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11वीं की छात्रा गुरनूर कौर ने दूर की ऑक्सीमीटर की बड़ी खामी

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PARDARSHI VIKASH NEWS खून में ऑक्सीजन की मात्रा मापने वाला पल्स ऑक्सीमीटर लंबे समय से दुनिया भर के अस्पतालों और मरीजों के लिए बेहद महत्वपूर्ण उपकरण रहा है। डॉक्टर इसकी रीडिंग के आधार पर मरीज की स्थिति का आकलन करते हैं और इलाज की दिशा तय करते हैं। हालांकि वर्षों से यह पाया गया था कि यह उपकरण गोरी त्वचा वाले लोगों में अपेक्षाकृत सटीक परिणाम देता है, लेकिन गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों में कई बार ऑक्सीजन स्तर वास्तविकता से अधिक दिखाता है। इससे मरीज की गंभीर स्थिति का समय पर पता नहीं चल पाता था और उपचार में देरी हो सकती थी।करीब 35 वर्षों से वैज्ञानिक इस समस्या का समाधान खोजने में लगे थे। आम धारणा थी कि मशीनों के प्रशिक्षण में इस्तेमाल किए गए डेटा में विविधता की कमी के कारण यह समस्या पैदा हुई है। लेकिन कनाडा में 11वीं कक्षा की छात्रा गुरनूर कौर ने अपनी रिसर्च में पाया कि समस्या केवल डेटा की नहीं, बल्कि उस गणितीय मॉडल में भी है जिस पर ऑक्सीमीटर की गणना आधारित है।गुरनूर ने ऑक्सीमीटर की कार्यप्रणाली का गहराई से अध्ययन किया और पाया कि पारंपरिक मॉडल त्वचा में मौजूद मेलेनिन के कारण प्रकाश के बिखराव को सही ढंग से नहीं गिनता। ऑक्सीमीटर का आधार वैज्ञानिक सिद्धांत (बियर-लैम्बर्ट नियम) है, जिसके माध्यम से लाल और इन्फ्रारेड प्रकाश के अवशोषण को मापा जाता है। गुरनूर ने पाया कि मौजूदा गणना में एक महत्वपूर्ण करेक्शन फैक्टर की कमी थी, जिससे गहरे रंग की त्वचा वाले लोगों की रीडिंग प्रभावित होती थी।उन्होंने एक नया गणितीय मॉडल विकसित किया जो त्वचा के रंग और प्रकाश के बिखराव के प्रभाव को स्वतः समायोजित करता है। इस सुधार के बाद मशीन केवल रक्त में मौजूद ऑक्सीजन के स्तर पर ध्यान देती है और त्वचा का रंग परिणामों को प्रभावित नहीं करता। इससे विभिन्न त्वचा रंगों वाले लोगों के लिए ऑक्सीमीटर की सटीकता में उल्लेखनीय सुधार संभव हुआ है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार चिकित्सा क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकता है। सटीक रीडिंग मिलने से डॉक्टर मरीजों की स्थिति का बेहतर आकलन कर सकेंगे, समय पर ऑक्सीजन और आईसीयू जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा सकेंगे तथा गंभीर मामलों में मृत्यु दर कम करने में मदद मिलेगी।गुरनूर कौर को उनके इस नवाचार के लिए कनाडा के प्रतिष्ठित कनाडा-वाइड साइंस फेयर 2026 में “बेस्ट प्रोजेक्ट अवॉर्ड फॉर इनोवेशन” से सम्मानित किया गया। प्रतियोगिता में पूरे कनाडा से सैकड़ों युवा वैज्ञानिकों ने भाग लिया था, लेकिन गुरनूर की खोज ने विशेष ध्यान आकर्षित किया क्योंकि इसने चिकित्सा तकनीक की एक पुरानी और महत्वपूर्ण समस्या को नई दिशा दी है।