
पारदर्शी विकास न्यूज़ कानपुर। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के प्रभावी क्रियान्वयन और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन को लेकर मंगलवार को सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला की अध्यक्षता करते हुए जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ शहर के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कचरे का स्रोत स्तर पर पृथक्करण और वैज्ञानिक निस्तारण बेहद जरूरी है।जिलाधिकारी ने कहा कि अब केवल नगर निकायों पर ही कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं होगी। बड़े होटल, अस्पताल, औद्योगिक इकाइयां, आवासीय परिसर और अन्य संस्थानों को अपने यहां उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन स्वयं सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने नगर निगम को निर्देश दिए कि वर्तमान कूड़ा संग्रहण और निस्तारण व्यवस्था की समीक्षा कर नई कार्ययोजना तैयार की जाए।कार्यशाला में बताया गया कि अब कचरे को चार श्रेणियों में अलग करना होगा। हरे डस्टबिन में गीला कचरा, नीले में सूखा कचरा, लाल में स्वच्छता संबंधी अपशिष्ट तथा काले डस्टबिन में घरेलू खतरनाक अपशिष्ट रखा जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण होने से पुनर्चक्रण और निस्तारण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी।उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अजीत कुमार सुमन ने बताया कि 20 हजार वर्गमीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले परिसर, प्रतिदिन 40 केएलडी से अधिक जल उपयोग करने वाले संस्थान अथवा 100 किलोग्राम से अधिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करने वाले प्रतिष्ठान ‘बल्क वेस्ट जेनरेटर’ की श्रेणी में आएंगे। ऐसे संस्थानों के लिए पंजीकरण और वार्षिक रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा।उन्होंने बताया कि गीले कचरे का निस्तारण परिसर में ही कम्पोस्टिंग या बायोमीथनेशन के माध्यम से करना होगा, जबकि अन्य अपशिष्ट अधिकृत एजेंसियों को सौंपना होगा। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर पर्यावरणीय प्रतिकर और अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।कार्यशाला में ऑनलाइन मॉनिटरिंग, संसाधन पुनर्प्राप्ति और सतत अपशिष्ट प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई।