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एक मंथन : सहकारिता से ही आर्थिक स्वावलंबन संभव

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उमाकांत शर्मा
पारदर्शी विकास न्यूज़
 

विचारभारत को यदि आर्थिक रूप से स्वावलंबी और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना है, तो हमें अपनी सामूहिक शक्ति को पहचानना होगा। हमारे देश में संसाधनों की कोई कमी नहीं है। हमारे पास विशाल मानवशक्ति है, कृषि संसाधन हैं, पशुधन है, प्राकृतिक संसाधन हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि समाज के करोड़ों लोग किसी न किसी रूप में सहकारिता से जुड़े हुए हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि इन संसाधनों और लोगों की सामूहिक शक्ति का सही दिशा में उपयोग कैसे किया जाए।भारत में लगभग 9 लाख सहकारी समितियां हैं और करोड़ों लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहकारिता से जुड़े हुए हैं। यह संख्या अपने आप में भारत की एक बहुत बड़ी सामाजिक और आर्थिक शक्ति है। यदि इतनी बड़ी संख्या में जुड़े लोगों को केवल समितियों की औपचारिक गतिविधियों तक सीमित न रखकर आर्थिक स्वावलंबन के व्यापक अभियान से जोड़ा जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।सहकारिता का मूल विचार ही है—साथ मिलकर आगे बढ़ना। एक व्यक्ति अकेले जितना कर सकता है, उससे कहीं अधिक कार्य अनेक लोग मिलकर कर सकते हैं। यही सिद्धांत आर्थिक क्षेत्र में भी लागू होता है। यदि करोड़ों परिवार अपनी आवश्यकताओं का कुछ हिस्सा स्वयं पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ें और स्थानीय स्तर पर उत्पादन तथा उपभोग का संतुलन विकसित हो, तो देश की विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता निश्चित रूप से कम की जा सकती है।आज दुनिया के अनेक देश भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखते हैं। विदेशी कंपनियां और उत्पाद भारत के करोड़ों उपभोक्ताओं तक पहुंचते हैं और इसके माध्यम से उनके देशों की अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार भारतीय उत्पादों, भारतीय उद्यमियों और भारतीय सहकारी संस्थाओं के लिए कितना बड़ा अवसर बन सकता है?यदि सहकारिता से जुड़े करोड़ों लोगों को स्वदेशी उत्पादन, स्वदेशी विकल्प और स्थानीय अर्थव्यवस्था के विस्तार से जोड़ा जाए, तो इसका प्रभाव बहुत व्यापक हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि दुनिया से व्यापार पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। वैश्विक व्यापार आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जहां देश में गुणवत्तापूर्ण विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं, वहां स्थानीय उत्पादन और स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देने की संस्कृति विकसित करना निश्चित रूप से आर्थिक रूप से लाभकारी हो सकता है।इस दिशा में ऊर्जा स्वावलंबन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र हो सकता है। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में पशुपालन व्यापक स्तर पर होता है। पशुधन के कारण गोबर जैसे जैविक संसाधन बड़ी मात्रा में उपलब्ध होते हैं। इन्हीं संसाधनों से बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा सकते हैं। यदि सहकारी समितियां गांवों में सामूहिक रूप से बायोगैस संयंत्रों की स्थापना, संचालन और रखरखाव की व्यवस्था विकसित करें, तो इससे खाना पकाने के ईंधन के साथ-साथ जैविक खाद के उत्पादन को भी बढ़ावा मिल सकता है।बायोगैस का विचार केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कई गतिविधियां जुड़ सकती हैं। गोबर से गैस, गैस से ऊर्जा और शेष जैविक पदार्थ से खाद तैयार की जा सकती है। इससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिल सकता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कुछ हद तक कम करने की दिशा में काम हो सकता है।इसी प्रकार सौर ऊर्जा को भी सहकारिता के माध्यम से व्यापक स्तर पर अपनाया जा सकता है। गांवों और कस्बों में सहकारी संस्थाएं सामूहिक सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित कर सकती हैं। घरों, सहकारी भवनों, विद्यालयों, छोटे उद्योगों और कृषि से जुड़ी गतिविधियों में सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाया जा सकता है। इससे बिजली के खर्च को कम करने के साथ-साथ ऊर्जा के स्थानीय उत्पादन की संस्कृति विकसित हो सकती है।कल्पना कीजिए कि करोड़ों परिवार अपनी जरूरत की ऊर्जा का एक हिस्सा स्वयं उत्पन्न करने लगें। करोड़ों परिवार स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें। गांवों में छोटी-छोटी उत्पादन इकाइयां स्थापित हों। किसान अपनी उपज के प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन से सीधे जुड़ें। महिलाओं की स्वयं सहायता समूहों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को बाजार मिले। युवाओं को गांव में ही रोजगार और उद्यमिता के अवसर उपलब्ध हों।तब सहकारिता केवल एक संस्था नहीं रहेगी, बल्कि आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि उत्पादन और उपभोग के बीच ऐसा संबंध स्थापित करना भी है जिससे देश की संपदा देश के भीतर अधिक समय तक घूमती रहे। यदि स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ता है और स्थानीय उत्पादों की मांग भी बढ़ती है, तो धन का प्रवाह गांव से शहर और फिर विदेश जाने के बजाय देश के भीतर अधिक मजबूत हो सकता है।इसीलिए सहकारिता को केवल दूध समितियों, कृषि समितियों या ऋण समितियों तक सीमित देखने की आवश्यकता नहीं है। सहकारिता को ऊर्जा, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, विपणन, लघु उद्योग, हस्तशिल्प, डिजिटल सेवाओं और स्थानीय उत्पादन जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की आवश्यकता है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे अभियान में सरकार की भूमिका सहयोगी और सुविधादाता की हो सकती है, लेकिन समाज की भागीदारी सबसे आवश्यक होगी। हर समस्या का समाधान केवल सरकारी बजट से संभव नहीं है। यदि समाज अपनी सामूहिक शक्ति को पहचान ले और सहकारी संस्थाएं अपने सदस्यों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ें, तो सीमित सरकारी सहायता से भी बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।हालांकि बड़े आर्थिक दावों को व्यवहार में बदलने के लिए ठोस आंकड़ों, लागत, तकनीकी व्यवहार्यता और बाजार की वास्तविक परिस्थितियों का अध्ययन जरूरी होगा। लेकिन विचार का मूल अत्यंत महत्वपूर्ण है—भारत की करोड़ों आबादी यदि छोटे-छोटे स्तर पर आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए, तो उसका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।आर्थिक स्वावलंबन केवल बड़े उद्योगों से नहीं आएगा। यह घर, गांव, किसान, मजदूर, युवा, महिला, व्यापारी और सहकारी संस्था—सभी के सम्मिलित प्रयास से आएगा।हमें यह तय करना होगा कि हम केवल बाजार के उपभोक्ता बनकर रहेंगे या स्वयं उत्पादक भी बनेंगे। हम केवल बाहर से ऊर्जा खरीदेंगे या अपनी ऊर्जा का कुछ हिस्सा स्वयं पैदा करेंगे। हम केवल कच्चा माल बेचेंगे या उसका प्रसंस्करण करके मूल्यवर्धित उत्पाद बनाएंगे।आज आवश्यकता है कि सहकारिता से जुड़े करोड़ों लोगों को एक व्यापक आर्थिक अभियान से जोड़ा जाए। स्वदेशी उत्पादन, स्थानीय उद्यम, बायोगैस, सौर ऊर्जा, कृषि प्रसंस्करण और सामूहिक विपणन जैसे क्षेत्रों में छोटे-छोटे प्रयोग शुरू किए जाएं और सफल मॉडल को तेजी से दूसरे क्षेत्रों में दोहराया जाए।यदि भारत के करोड़ों लोग यह संकल्प लें कि वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में जहां संभव होगा, स्थानीय और स्वदेशी विकल्पों को बढ़ावा देंगे तथा उत्पादन और रोजगार के अवसर अपने आसपास विकसित करेंगे, तो आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा सकता है।सहकारिता में केवल संगठन की शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक परिवर्तन की अपार संभावना छिपी है। हमें आवश्यकता है उस संभावना को पहचानने, उसे सही दिशा देने और जमीन पर उतारने की।आज नहीं तो कल, भारत को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनना ही होगा। और यदि इस लक्ष्य को व्यापक जनभागीदारी के साथ, कम समय में और स्थायी रूप से प्राप्त करना है, तो सहकारिता एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकती है।आइए, सहकारिता को केवल संस्था न मानें, इसे आर्थिक स्वावलंबन का जनआंदोलन बनाएं।