
उत्तर प्रदेश का औद्योगिक नगर कानपुर कभी अपनी पहचान उद्योग, शिक्षा और व्यापार के लिए रखता था। आज भी यह प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में गिना जाता है, लेकिन शहर की वास्तविक तस्वीर विकास के दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। हर वर्ष बरसात शुरू होते ही कानपुर की सड़कों की हालत ऐसी हो जाती है कि यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि सड़क पर गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क। जलभराव, टूटी सड़कें, जाम, सीवर का उफान और बदहाल नालियां अब किसी एक मौसम की समस्या नहीं रह गई हैं, बल्कि वर्षों से शहर की पहचान बन चुकी हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यह स्थिति नई नहीं है। हर साल बारिश आती है, सड़कें टूटती हैं, जलभराव होता है, लोग परेशान होते हैं, प्रशासन निरीक्षण करता है, जिम्मेदार अधिकारी निर्देश जारी करते हैं और कुछ दिनों बाद मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है। अगले वर्ष वही कहानी दोहराई जाती है। सवाल यह है कि आखिर इस चक्र का अंत कब होगा? कानपुर के अधिकांश प्रमुख मार्गों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कई स्थानों पर सड़कें पूरी तरह गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं। दोपहिया वाहन चालक सबसे अधिक हादसों का शिकार हो रहे हैं। कई क्षेत्रों में सड़कें इतनी खराब हैं कि पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है। बारिश के दौरान जब इन गड्ढों में पानी भर जाता है, तब दुर्घटना की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। आम नागरिक रोज जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं। जलभराव की समस्या भी कानपुर के लिए नई नहीं है। शहर के अनेक मोहल्लों, बाजारों और मुख्य मार्गों पर थोड़ी सी बारिश के बाद ही पानी भर जाता है। कई इलाकों में घरों और दुकानों तक में पानी घुस जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों, नौकरीपेशा लोगों, व्यापारियों और मरीजों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बार एंबुलेंस तक जलभराव में फंस जाती हैं। यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि जनसुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।हर वर्ष नालों की सफाई के दावे किए जाते हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने की बात कही जाती है। प्री-मानसून तैयारियों की बैठकें होती हैं, योजनाएं बनती हैं और निरीक्षण भी किए जाते हैं। लेकिन पहली ही तेज बारिश इन तैयारियों की वास्तविकता सामने ला देती है। यदि सफाई समय पर और ईमानदारी से हुई होती, तो शहर के अधिकांश हिस्से पानी में डूबे नजर नहीं आते।नगर निगम, जल निगम, लोक निर्माण विभाग, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित एजेंसियां अपने-अपने स्तर पर कार्य करने का दावा करती हैं। लेकिन जब जिम्मेदारी कई विभागों में बंट जाती है, तब जवाबदेही कहीं खो जाती है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि यदि सड़क कुछ ही महीनों में टूट जाती है, यदि नाले हर वर्ष जाम हो जाते हैं और यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी हालात नहीं बदलते, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?कानपुर जैसे महानगर में केवल नई परियोजनाओं की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ यह है कि नागरिक सुरक्षित और सुविधाजनक जीवन जी सकें। यदि आम आदमी रोज गड्ढों, जलभराव और जाम से जूझ रहा है, तो विकास के बड़े-बड़े दावे उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। शहर की मूलभूत सुविधाओं को मजबूत करना किसी भी प्रशासन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।समस्या केवल बारिश तक सीमित नहीं है। खराब सड़कों के कारण वाहन जल्दी खराब होते हैं, ईंधन की खपत बढ़ती है, यातायात बाधित होता है और आर्थिक नुकसान भी होता है। जलभराव के कारण मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है, जिससे डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। यानी यह केवल सड़क और पानी का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और शहर की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।अब समय केवल निरीक्षण, बैठकों और आश्वासनों का नहीं, बल्कि स्थायी समाधान का है। शहर की सभी जर्जर सड़कों का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्निर्माण किया जाए, जल निकासी व्यवस्था को आधुनिक बनाया जाए, नालों की सफाई की स्वतंत्र निगरानी हो और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता तय मानकों के अनुसार सुनिश्चित की जाए। साथ ही जिन परियोजनाओं में लापरवाही या निम्न गुणवत्ता पाई जाए, उनके लिए संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो।कानपुर के नागरिक केवल शिकायत नहीं कर रहे, बल्कि अपने अधिकार की मांग कर रहे हैं। उन्हें ऐसी सड़कें चाहिए जिन पर सुरक्षित चला जा सके, ऐसी जल निकासी व्यवस्था चाहिए जिससे बारिश आफत न बने और ऐसा प्रशासन चाहिए जो हर वर्ष एक जैसी समस्याओं पर केवल बयान न दे, बल्कि स्थायी समाधान प्रस्तुत करे।कानपुर विकास की अपार संभावनाओं वाला शहर है। उद्योग, व्यापार, शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में इसकी पहचान पूरे देश में है। लेकिन यदि शहर की मूलभूत समस्याएं वर्षों तक जस की तस बनी रहें, तो विकास की तस्वीर अधूरी ही मानी जाएगी। अब यह समय है कि जिम्मेदार संस्थाएं दावों से आगे बढ़कर धरातल पर परिणाम दिखाएं। क्योंकि जनता को वादों की नहीं, ऐसी सड़कों की जरूरत है जिन पर बिना डर के चला जा सके और ऐसे शहर की जरूरत है जो हर बारिश में डूबने के बजाय विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ता दिखाई दे। -सुशील कुमार ,सम्पादक