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क्या आंदोलनों की दिशा बदल रही है? लोकतंत्र, छात्र राजनीति और विपक्ष की भूमिका पर एक विमर्श

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— अरविन्द दुबे

लोकतंत्र में असहमति का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने, सरकार की नीतियों का समर्थन या विरोध करने तथा शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी आंदोलन का स्वरूप मूल उद्देश्य से भटककर राजनीतिक टकराव, अराजकता और हिंसा की ओर मुड़ जाता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि पूरे घटनाक्रम का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए। हाल के वर्षों में देश में हुए विभिन्न आंदोलनों ने यही प्रश्न खड़ा किया है कि क्या आंदोलन वास्तव में जनहित के लिए हो रहे हैं, या वे धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं? पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अनेक बड़े जन आंदोलनों को देखा। कृषि कानूनों के विरोध में चला किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर हुए प्रदर्शन, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर छात्रों के आंदोलन तथा अन्य कई विरोध कार्यक्रम राष्ट्रीय बहस का विषय बने। प्रत्येक आंदोलन की अपनी अलग परिस्थितियाँ, मांगें और कारण थे, लेकिन एक समान प्रश्न हर बार सामने आया कि क्या इन आंदोलनों की बागडोर अंत तक उन्हीं लोगों के हाथ में रही जिनके हितों के लिए वे शुरू हुए थे, या बाद में उनमें राजनीतिक और वैचारिक हित भी शामिल हो गए? किसान आंदोलन के दौरान लाखों किसानों ने अपनी आशंकाओं को सरकार के सामने रखा। सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई और अंततः केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। इस पूरे घटनाक्रम में अनेक लोगों का मानना था कि आंदोलन के अंतिम चरण में कई ऐसे तत्व भी सक्रिय हो गए जिनका उद्देश्य केवल कृषि कानूनों का विरोध नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश देना था। वहीं दूसरी ओर आंदोलन के समर्थकों का तर्क था कि यह किसानों की लोकतांत्रिक जीत थी। स्पष्ट है कि एक ही घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा गया।इसी प्रकार नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर भी देशभर में व्यापक बहस हुई। कानून के समर्थकों का कहना था कि इसका उद्देश्य पड़ोसी देशों से धार्मिक उत्पीड़न झेलकर आए कुछ समुदायों को नागरिकता देने का प्रावधान करना था, जबकि विरोध करने वालों ने इसे लेकर संवैधानिक और सामाजिक आशंकाएँ व्यक्त कीं। इस विषय पर देशभर में प्रदर्शन हुए और राजनीतिक दलों ने भी अपने-अपने दृष्टिकोण से भूमिका निभाई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि लोकतंत्र में किसी भी कानून की व्याख्या और उसके प्रभाव को लेकर मतभेद स्वाभाविक हैं।हाल के समय में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं को लेकर भी छात्र आंदोलनों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। जब किसी परीक्षा में अनियमितता, पेपर लीक या पारदर्शिता को लेकर प्रश्न उठते हैं, तब छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक होता है। लाखों युवाओं का भविष्य ऐसी परीक्षाओं पर निर्भर करता है। इसलिए सरकार का दायित्व है कि जांच निष्पक्ष हो, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो और परीक्षा प्रणाली पर जनता का विश्वास बना रहे। साथ ही यह भी आवश्यक है कि छात्र आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहें और किसी भी प्रकार की हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या कानून व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से दूर रहें।लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। विपक्ष सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है, कमियों की ओर ध्यान दिलाता है और जनता की आवाज़ को संसद तथा सार्वजनिक मंचों तक पहुँचाता है। लेकिन जब विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करता हुआ दिखाई देता है, तब उसकी विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठते हैं। दूसरी ओर यदि सरकार जनभावनाओं और आलोचनाओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करे, तब लोकतांत्रिक संतुलन भी प्रभावित होता है। इसलिए सशक्त लोकतंत्र के लिए जिम्मेदार सरकार और जिम्मेदार विपक्ष दोनों आवश्यक हैं। आज सोशल मीडिया ने आंदोलनों की दिशा और गति दोनों बदल दी हैं। कुछ ही घंटों में कोई भी मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। सकारात्मक पक्ष यह है कि आम नागरिक अपनी बात सीधे देश के सामने रख सकता है। लेकिन नकारात्मक पक्ष यह है कि कई बार अधूरी जानकारी, भ्रामक सामग्री, भावनात्मक अपील और अफवाहें भी उसी गति से फैलती हैं। ऐसे वातावरण में प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह किसी भी सूचना पर विश्वास करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करे।यह भी देखने में आता है कि किसी भी आंदोलन के दौरान कुछ असामाजिक तत्व हिंसा, तोड़फोड़ या उकसावे की कोशिश करते हैं। यदि ऐसा होता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है। लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कुछ व्यक्तियों के व्यवहार के आधार पर पूरे आंदोलन या उसमें शामिल सभी लोगों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। लोकतांत्रिक समाज में जिम्मेदारी व्यक्तिगत आचरण के आधार पर तय होती है।देश के युवाओं के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को समझना भी है। छात्रों का आंदोलन तब प्रभावी होता है जब वह तथ्यों, अनुशासन और स्पष्ट मांगों के आधार पर संचालित हो। हिंसा, अपमानजनक भाषा और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने वाली गतिविधियाँ किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करती हैं। दूसरी ओर सरकारों को भी छात्रों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुनना चाहिए और समयबद्ध समाधान प्रस्तुत करना चाहिए।भारत की लोकतांत्रिक परंपरा संवाद और सहमति की रही है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के माध्यम से यह सिखाया कि बिना हिंसा के भी बड़े परिवर्तन संभव हैं। संविधान निर्माताओं ने भी असहमति को लोकतंत्र की शक्ति माना है, कमजोरी नहीं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि मतभेदों को टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाया जाए।आज आवश्यकता किसी एक दल, एक संगठन या एक आंदोलन को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करने की है। सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाए, विपक्ष रचनात्मक भूमिका निभाए, छात्र अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझें और समाज तथ्य आधारित चर्चा को प्राथमिकता दे। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और जनविश्वास भी बना रहेगा। अंततः राष्ट्र किसी एक सरकार, किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक आंदोलन से बड़ा होता है। देशहित, सामाजिक शांति, संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा सभी की साझा जिम्मेदारी है। यदि आंदोलनों का उद्देश्य जनहित है तो उनका मार्ग भी लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार होना चाहिए। इसी में लोकतंत्र की सफलता और राष्ट्र की शक्ति निहित है।