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मोहर्रम की परंपरा: ताजियों में दिखती है आस्था और गंगा-जमुनी तहजीब

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पारदर्शी विकास न्यूज़ लखनऊ।  मोहर्रम का चांद नजर आते ही माहौल अकीदत और मातम से भर जाता है। पुराने लखनऊ में मोहर्रम के दौरान करीब दो महीने आठ दिन तक मजलिसों का आयोजन होता है। शिया समुदाय के लोग अपने घरों और इमामबाड़ों में ताजिया रखते हैं।लखनऊ में ताजिया निकालने की परंपरा करीब 187 साल पुरानी बताई जाती है। मोहर्रम की पहली शाम बड़े इमामबाड़े से शाही जरी ताजिया का जुलूस निकाला जाता है। यहां कागज, लकड़ी, मोम और चांदी से बनी ताजिया लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इनकी कीमत कुछ सौ रुपये से लेकर लाखों रुपये तक पहुंच जाती है।इतिहासकारों के अनुसार, लखनऊ में ताजिया जुलूस की शुरुआत अवध के तीसरे नवाब मोहम्मद अली शाह के समय वर्ष 1839 में हुई थी। पहली मोहर्रम पर बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक शाही जरी का जुलूस निकालने की परंपरा उन्हीं के दौर में शुरू हुई।कारीगरों के अनुसार, शाही जरी ताजिया तैयार करने में कई महीने लग जाते हैं। कुछ ताजिया 20 फीट से ज्यादा ऊंची बनाई जाती हैं और इन्हें तैयार करने में कई लोग मिलकर मेहनत करते हैं। मोम की ताजिया बनाने में खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है।लखनऊ के बाजारों में लकड़ी की नक्काशीदार ताजिया की भी काफी मांग रहती है। कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हुए हैं। कुछ ताजिया देश के बाहर भी भेजी जाती रही हैं।मोहर्रम से जुड़ी चांदी की ताजिया और अन्य धार्मिक प्रतीक भी सर्राफा बाजार में तैयार किए जाते हैं। खास बात यह है कि इन्हें बनाने वाले कई कारीगर अलग-अलग समुदायों से आते हैं। यही लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाता है।