
16,500 से अधिक लावारिस शवों का कराया अंतिम संस्कार
पारदर्शी विकास न्यूज़ कानपुर। समाजसेवी धनीराम पैंथर पिछले चार दशक से अधिक समय से समाज सेवा के कार्यों में जुटे हैं। उन्होंने वर्ष 2005 से लावारिस शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार की पहल शुरू की और अब तक 16,500 से अधिक लावारिस शवों का उनके धर्म और रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करा चुके हैं।धनीराम पैंथर ने बताया कि वर्ष 2000 के आसपास उन्होंने देखा कि लावारिस शवों को पोस्टमार्टम हाउस से एक साथ ले जाकर गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता था। इस दृश्य ने उन्हें झकझोर दिया और उन्होंने ऐसे शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार का संकल्प लिया। इसके बाद समाज कल्याण सेवा समिति के माध्यम से यह अभियान शुरू किया गया।उन्होंने बताया कि 15 मार्च 2009 से इस कार्य को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। इसके लिए 10 लोगों की टीम बनाई गई, जो कानपुर नगर, कानपुर देहात और उन्नाव में लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का कार्य करती है। संस्था के पास चार शव वाहन भी हैं, जिनकी मदद से शवों को श्मशान या कब्रिस्तान तक पहुंचाया जाता है।धनीराम पैंथर के अनुसार संस्था केवल कफन, बांस और लकड़ी के रूप में सहयोग स्वीकार करती है। समय के साथ समाज के विभिन्न वर्गों और धर्मों के लोग भी इस अभियान से जुड़े और अंतिम संस्कार में सहयोग करने लगे।कोरोना महामारी के दौरान जब कई लोग अपने परिजनों के अंतिम संस्कार से भी दूरी बना रहे थे, तब संस्था ने 50 स्वयंसेवकों की टीम के साथ लगभग 2,950 शवों का अंतिम संस्कार कराया। एक दिन में सर्वाधिक 109 शवों का अंतिम संस्कार भी इसी दौरान किया गया।वर्ष 2025 से धनीराम पैंथर ने मरणोपरांत देहदान के लिए जागरूकता अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत उन्होंने स्वयं और उनकी पत्नी मनीषा पैंथर ने अपने शरीर का मरणोपरांत देहदान करने का संकल्प लिया है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर या तो मिट्टी में मिल जाता है या अग्नि को समर्पित हो जाता है, ऐसे में यदि वही शरीर किसी के जीवन और चिकित्सा शिक्षा के काम आ सके तो यह समाज के लिए बड़ा योगदान होगा। इस मुहिम से अब तक 50 से अधिक लोग जुड़ चुके हैं। धनीराम पैंथर का जन्म वर्ष 1965 में कानपुर के मकराबर्टगंज क्षेत्र में हुआ था। छात्र जीवन से ही सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे धनीराम कई जनआंदोलनों में हिस्सा लेने के कारण 17 बार जेल भी जा चुके हैं। समाज सेवा को उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया और आज उनकी संस्था के हजारों सदस्य विभिन्न सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनकी पत्नी मनीषा पैंथर का कहना है कि समाज सेवा के प्रति उनके पति का समर्पण देखकर उन्होंने भी देहदान का निर्णय लिया। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी यदि किसी के काम आया जा सके तो इससे बड़ा सौभाग्य और कुछ नहीं हो सकता।