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*देवरिया के नाम, एक आम देवरिया वासी जनसेवक के मन की बात*

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पारदर्शी विकास ब्यूरो देवरिया 

मेरे देवरिया के खूबसूरत इंसानों, मैं आज किसी पद की, किसी कुर्सी की बात नहीं कर रहा हूँ। आज मेरा मन बहुत भरा हुआ है किसी चिंता से, और मैं एक भाई की तरह, इस देवरिया के एक बेटे की तरह आपसे अपने दिल की बात कहना चाहता हूँ।ज़रा एक पल रुककर सोचिए - हम कितनी पावन धरती के वासी हैं।यह वही देवरिया है, जिसे "देवारण्य" अर्थात देवताओं का वन कहा गया। यह ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा की तपोभूमि है, जिनके चरणों में बैठने को मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री समेत पूरा देश तरसता था। यह बाबा राघव दास की कर्मभूमि है, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी गरीब, बेसहारा और समाज की सेवा में, शिक्षा के प्रसार में लुटा दी।और आँखें भर आती हैं यह सोचकर , जब अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी हुई, तो उनकी अस्थियों को इसी देवरिया के बरहज में, सरयू माँ के आँचल में, बाबा राघव दास सहेज लाए और वहाँ उनकी समाधि बनवाई। वही बिस्मिल, जिनके सबसे प्यारे साथी थे अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ , एक हिंदू, एक मुसलमान, जो माँ भारती के लिए एक साथ, हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम गए। आप लोग जरा सोचिए — हिंदू-मुस्लिम एकता की वह अमर निशानी आज भी हमारी ही देवरिया की पवित्र धरती पर साँस ले रही है।और हमारा वह नन्हा फूल, शहीद रामचंद्र विद्यार्थी? सिर्फ़ 13 बरस की उम्र में, तथा ग्राम सभा सहोदर पट्टी विकास खंड देसही देवरिया निवासी अमर वीर सपूत श्री सोना उर्फ शिवराज स्वर्णकार 14 अगस्त 1942 को, अपने गाँव से मीलों पैदल चलकर देवरिया कलेक्ट्रेट की छत पर चढ़ गया, अंग्रेज़ों का झंडा नोचकर फेंक दिया, तिरंगा फहरा दिया और सीने पर गोली खाकर शहीद हो गये । देश के सबसे छोटे बलिदानियों में हमारे देवरिया का यह लाल अमर शहीद सोना स्वर्णकार के साथ अमर है।यही असली परिचय और पहचान देवरिया की है मेरे भाइयो। संतों की धरती, शहीदों की धरती, प्रतिभाओं की धरती, साम्प्रदायिक सौहाद्र की धरती।हमें सीना चौड़ा करके गर्व है कि हमारे देवरिया में कभी, कभी भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ। आज़ादी की लड़ाई में हिंदू और मुसलमान यहाँ एक साथ कंधा मिलाकर लड़े, और आज़ादी के बाद भी सदियों से एक ही गाँव, एक ही मोहल्ले में, एक परिवार बनकर जिए। यही हमारी पहचान है, यही हमारी सबसे बड़ी पूँजी है। यही बात हमे देवभूमि बनाती है।अब एक बात मेरे दिल से सुन लीजिए, और सदा के लिए गाँठ बाँध लीजिए-कोई भी नेता हो, चाहे कोई भी , किसी भी पार्टी से हो, अगर चुनाव पास आते ही वह हिंदू-मुसलमान की, नफरत की, दंगे-फसाद की बात करने लगे, तो उसके मंसूबों को कभी कामयाब मत होने दीजिए।क्योंकि सच यह है कि जिसके पास सड़क, पानी, रोज़गार, अस्पताल, और आपके बच्चों के भविष्य के लिए कोई सपना नहीं होता, वही आपको आपस में लड़ाकर वोट बटोरना चाहता है। नफरत की बात करके वह खुद ही बता देता है कि उसकी झोली विकास के मामले में बिलकुल खाली है।मेरे देवरिया के हर भाई से, हर बहन से, हर धर्म, हर मज़हब के अपनों से हाथ जोड़कर विनती है , किसी की भड़काऊ बात पर एक भी गलत कदम मत उठाइए। अपने और अपने बच्चों के विकसित भविष्य के बारे में सोचिए। हमारे पुरखों ने सैकड़ों साल में जो भाईचारा सींचा है, उसे किसी की एक चुनावी चाल में मत बह जाने दीजिए।क्योंकि याद रखिए, कोई नेता तो आज है, कल वह नहीं रहेगा… पर उसकी फैलाई हुई नफरत हमेशा के लिए रह जाएगी। एक बार दंगों का दाग लग गया, तो उसे धोने में हमारी पीढ़ियाँ खप जाएँगी, और हमारे बच्चे हमें कभी माफ़ नहीं करेंगे।आइए, मिलकर वचन लें , हम देवरिया को नफरत की आग में नहीं झोंकने देंगे। हम इसे विकास की राह पर ले चलेंगे। किसी पार्टी या विचारधारा से ज्यादा ऊपर है हमारा सुख चैन, हमारी तरक्की। "विकसित भारत, विकसित देवरिया" यही हमारा सपना होना चाहिए, यही हमारी मंज़िल होनी चाहिए।देवरिया अपने बेटों की प्रतिभा के लिए जाना जाए , दंगों के लिए कभी नहीं।"ये दुनिया नफ़रतों के आख़री स्टेज पे है,इलाज इस का मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है"