
पारदर्शी विकास न्यूज़ वाराणसी। जैन धर्म के दश लक्षण पर्युषण महापर्व के सप्तम दिवस ‘उत्तम तप’ धर्म पर श्रद्धालुओं को तप और आत्मशुद्धि का संदेश दिया गया। इस अवसर पर कहा गया कि जिस प्रकार बिना छैनी के पाषाण से प्रतिमा नहीं बनती और दूध से घी नहीं निकलता, उसी प्रकार तप के बिना आत्मा के परमात्म स्वरूप की प्राप्ति संभव नहीं है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कर्मों के क्षय के लिए किया जाने वाला साधना-प्रयास तप कहलाता है। तप का वास्तविक स्वरूप इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्मसंयम में माना गया है। श्रद्धालुओं से अपनी सामर्थ्य के अनुसार तप करने और सामर्थ्य न होने पर तप के प्रति श्रद्धा बनाए रखने का संदेश दिया गया। इस अवसर पर मिट्टी का उदाहरण देते हुए बताया गया कि पैरों से रौंदी जाने वाली मिट्टी सूखकर घड़ा बनती है और अग्नि में तपने के बाद मंगल कलश का रूप ले लेती है। इसी प्रकार तप और साधना से मनुष्य का जीवन भी निखरता है। ‘उत्तम तप’ आत्मसंयम, कर्मक्षय और आत्मशुद्धि की दिशा में प्रेरणा देने वाला धर्म है।