
पारदर्शी विकास न्यूज़। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत में धर्म और राष्ट्र अलग-अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है और धर्म ही राष्ट्र को बनाए रखने में मदद करता है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यदि धर्म संकट में आएगा तो देश को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। उन्होंने ये बातें मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहीं। मोहन भागवत ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और समृद्ध ज्ञान परंपरा में निहित है। यहां भाषा, पूजा-पद्धति और राज्यों की विविधता है। हजारों जातियां और उपजातियां हैं, लेकिन इन विविधताओं के बावजूद विश्व में हमारी पहचान भारतीय के रूप में है। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता के साथ जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब और संतों की शिक्षाएं भी शामिल हैं। यह विशाल ज्ञान परंपरा आज दुनिया के लिए उपयोगी हो सकती है। भागवत ने कहा कि भारत ने कभी दूसरे देशों पर कब्जा करने या लोगों का धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश किए बिना अपना ज्ञान दुनिया के साथ साझा किया। उनके अनुसार, दुनिया आज विकास और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन तलाश रही है। भारत की ज्ञान परंपरा इन सवालों के समाधान खोजने में मदद कर सकती है। उन्होंने भक्ति को ईश्वर के करीब पहुंचने का माध्यम बताते हुए कहा कि भारत के पास ऐसा ज्ञान है, जिसकी आज दुनिया को जरूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि इस ज्ञान को आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन और परंपराओं की रक्षा करना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवता की सेवा भी है। उनके मुताबिक, इस परंपरा को सुरक्षित रखना पूरी मानव जाति के भविष्य की रक्षा करने जैसा है।
ज्ञानेश्वरी मोबाइल ऐप का किया लोकार्पण
सम्मेलन के बाद शाम को मोहन भागवत ने मुंबई के प्रभादेवी स्थित रवींद्र नाट्य मंदिर में ‘ज्ञानरंग : ज्ञानेश्वरी’ मोबाइल ऐप का लोकार्पण किया। यह कार्यक्रम संत ज्ञानेश्वर महाराज के 750वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस दौरान उन्होंने भारतीय पहचान और सांस्कृतिक विविधता पर विचार रखे। भागवत ने विदेश जाने वाले युवाओं, खासकर जेन-जी का उदाहरण देते हुए कहा कि विदेश में लोगों की जिज्ञासा होती है कि भारतीयों की अपनी विशेषता और पहचान क्या है। उन्होंने कहा कि भारत में भाषा, पूजा-पाठ के तरीके और राज्य अलग-अलग हैं, लेकिन विश्व में सभी की पहचान भारत के रूप में होती है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में रहने वाले लोग खुद को नागपुर या मुंबई का निवासी बताते हैं। उत्तर प्रदेश पहुंचने पर वे महाराष्ट्रीयन के रूप में पहचाने जाते हैं, जबकि अमेरिका जैसे देश में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के लोग भारतीय कहलाते हैं। उनके इस उदाहरण का आशय था कि क्षेत्रीय और भाषाई विविधताओं के बावजूद देश की साझा पहचान भारतीयता है। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में धर्म, राष्ट्र, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक पहचान को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया। उन्होंने कहा कि भारत की परंपराओं और ज्ञान को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ाना मानवता के भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है।