
नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर देखने के बाद वैशाली के लिए रवाना हुआ अमेठी का यात्री दल
पारदर्शी विकास न्यूज़ अमेठी। अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध धम्म तीर्थ स्थल यात्रा के बैनर तले बौद्ध तीर्थ स्थलों के भ्रमण पर गये अमेठी के यात्री दल ने बुधवार को नालंदा का भ्रमण कर ऐतिहासिक जानकारी हासिल की। नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर देखा और चीनी यात्री ह्वेन सांग स्मृति भवन के बारे में जानकारी हासिल की। यात्री दल का नेतृत्व कर रहे बौद्ध भिक्षु भंते धम्म ज्योति और भंते शील वंत ने यात्रियों को ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी दी। भंते धम्मज्योति ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना 6-7वीं शताब्दी ईस्वी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। इसके बाद हर्षवर्धन और पाल राजाओं ने भी इसे संरक्षण दिया। लगभग 800 वर्षों तक यह पूरी दुनिया के लिए ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा।अपने चरम पर यहाँ 10,000 से अधिक छात्र पढ़ते थे और उन्हें पढ़ाने के लिए 2,000 के करीब विख्यात आचार्य (शिक्षक) मौजूद थे। भारत ही नहीं, बल्कि चीन (ह्वेनसांग और इत्सिंग), तिब्बत, कोरिया, जापान, और इंडोनेशिया जैसे देशों से छात्र कठिन प्रवेश परीक्षा पास करके उच्च शिक्षा के लिए आते थे। केवल बौद्ध धार्मिक ग्रंथों (महायान और हीनयान) की ही नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान तर्कशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान , व्याकरण, दर्शनशास्त्र और वेदों की भी पढ़ाई होती थी। नालंदा का पुस्तकालय दुनिया का सबसे समृद्ध ज्ञान भंडार था, जिसे 'धर्मगंज' कहा जाता था। यह तीन बड़ी इमारतों—रत्नासागर, रत्नरंजक, और नौ मंजिला ऊंचे 'रत्नोदधि' में फैला हुआ था, जिसमें लाखों पांडुलिपियां और किताबें थीं।उन्होंने बताया कि 12वीं शताब्दी के अंत (लगभग 1193-1200 ईस्वी) में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने क्रूरतापूर्वक इस पूरे परिसर को ध्वस्त कर दिया और इसके महान पुस्तकालय में आग लगा दी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, यहाँ इतनी किताबें थीं कि पुस्तकालय की आग कई महीनों तक सुलगती रही।खुदाई के बाद वर्तमान में यह परिसर 23 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ दिखता है, जो प्राचीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है, यहाँ मुख्य रूप से 11 मठ (विहार) और 14 मंदिर (स्तूप) व्यवस्थित कतारों में बने हुए हैं। ये सभी लाल पकी हुई ईंटों से बने हैं। छात्रों के रहने के लिए बने हॉस्टल के कमरों में पत्थर के बेड, पढ़ाई के लिए आले और जल निकासी के लिए नालियों की उन्नत व्यवस्था आज भी देखी जा सकती है।यहाँ का सबसे मुख्य और आकर्षक ढांचा भगवान बुद्ध के परम शिष्य सारिपुत्र का स्तूप है, जो अष्टकोणीय पिरामिड की तरह दिखता है और चारों तरफ से छोटी मनौती स्तूपों से घिरा है।यात्रियों का दल नालंदा खंडहर देखने के बाद बुधवार को दोपहर 2:00 बजे वैशाली के लिए रवाना हुआ।पांचवें दिन यात्रा का नेतृत्व रायबरेली जिले के छतोह निवासी शंकर प्रसाद मौर्य बौद्धाचार्य किया। यात्रा में भंते शीलवंश के साथ डॉ रामसागर बौद्ध रामकुमार बौद्ध जीपी मौर्य, डॉ बृजेश मौर्य, विजय कुमार बौद्ध, गंगाराम, हरिश्चंद्र कोरी, शीला मौर्य रेखा बौद्ध, शिवानी , करन प्रताप बौद्ध, राम सुमिरन अलीगंज के 45 यात्री शामिल रहे।