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मान्यवर कांशीराम ने अमेठी रामलीला मैदान से बसपा को दिलाई थी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान

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सभी राजनीतिक दल मना रहे मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि,फिर उन्हें भारत रत्न का सम्मान क्यों नहीं दे रही सरकार


संजीव भारती/वेद प्रकाश
लखनऊ/अमेठी।
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे मान्यवर कांशीराम भारतीय राजनीति में ऐसे महानायक और महापुरुष हैं जिन्होंने बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के मानवतावादी मूवमेंट और उनके विचारों को धरातल पर उतारकर भारतीय राजनीति के व्याकरण को बदलने के साथ बहुजन समाज को हुक्मरान समाज की लाइन में खड़ा कर दिया।आज उनकी पुण्यतिथि देश के सभी राज्यों में मनाई जा रही है। बहुजन समाज पार्टी के साथ अन्य राजनीतिक दल भी मान्यवर कांशीराम को याद कर रहें हैं। ऐसे राजनीतिक दल भी याद कर रहें हैं जिन्होंने मान्यवर कांशीराम का जीते जी डटकर विरोध किया था और उन्हें आज तक सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न नहीं दिया।कांशीराम साहब का अमेठी की राजनीति से गहरा सम्बन्ध रहा है।1989में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने लोकसभा चुनाव लडा था और बहुजन समाज पार्टी को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के पटल पर लाने का काम किया था।पिछले वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने की चर्चा हुई थी, परंतु सरकार ने आज तक उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न का सम्मान नहीं दिया। भारतीय राजनीति के पर्याय हैं युग पुरुष कांशीरामकांशीराम भारतीय राजनीति के ऐसे महानायक थे, जिन्होंने अपने संघर्ष, त्याग और दूरदर्शी विचारधारा के बल पर भारतीय राजनीति का स्वरूप बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सदियों से सामाजिक भेदभाव और वंचना का सामना कर रहे बहुजन समाज को उसकी ताकत का एहसास कराया और उसे सत्ता में भागीदारी के लिए संगठित किया। उनका मानना था कि देश की सत्ता और संसाधनों में वंचित समाज की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक समानता का सपना पूरा नहीं हो सकता। इसी विचारधारा के साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन बहुजन समाज के अधिकारों और राजनीतिक चेतना को मजबूत करने के लिए समर्पित कर दिया। कांशीराम साहब का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के एक मध्यमवर्गीय रामदासिया सिख परिवार में हुआ था। नौकरी के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों और उनके संघर्षों से परिचित होने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। पुणे में सहायक वैज्ञानिक के पद पर कार्य करते समय आंबेडकर जयंती की छुट्टी और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े विवादों ने उन्हें सामाजिक भेदभाव की गंभीरता का एहसास कराया। इसके बाद उन्होंने नौकरी और व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को पीछे छोड़कर सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। कांशीराम ने सबसे पहले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षित कर्मचारियों को संगठित करने की दिशा में काम किया। इसी उद्देश्य से 6 दिसंबर 1978 को बामसेफ (BAMCEF) की स्थापना की गई। इसके बाद उन्होंने डीएस-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) के माध्यम से बहुजन समाज में राजनीतिक जागरूकता पैदा करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य वंचित वर्गों को केवल सामाजिक अधिकार दिलाना ही नहीं, बल्कि उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बनाना भी था। बहुजन समाज को राजनीतिक शक्ति में बदलने के उद्देश्य से कांशीराम ने 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की। उन्होंने देशभर में यात्राएं और जनसंपर्क अभियान चलाकर बहुजन समाज को एक राजनीतिक मंच पर लाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि सामाजिक परिवर्तन के लिए सत्ता में भागीदारी आवश्यक है। इसी विचारधारा के आधार पर उन्होंने उत्तर प्रदेश को बहुजन राजनीति की प्रयोगशाला बनाया और मायावती को नेतृत्व के लिए तैयार किया। आगे चलकर मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और बसपा ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।कांशीराम का जीवन त्याग, संघर्ष और सामाजिक प्रतिबद्धता का उदाहरण था। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन आंदोलन को समर्पित कर दिया। उनके लिए बहुजन समाज ही परिवार था और उसकी राजनीतिक जागरूकता ही सबसे बड़ी पूंजी। उन्होंने संपत्ति और व्यक्तिगत लाभ के बजाय संगठन निर्माण, सामाजिक समानता और राजनीतिक अधिकारों को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि बहुजन समाज की एकजुटता ही उसे सत्ता और व्यवस्था में सम्मानजनक स्थान दिला सकती है।15 दिसंबर 2001 को लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में आयोजित एक विशाल रैली में कांशीराम ने सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने मायावती को इस आंदोलन का उत्तराधिकारी घोषित करते हुए बहुजन समाज की राजनीतिक चेतना को आगे ले जाने का संदेश दिया। 9 अक्टूबर 2006 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके विचार और सामाजिक न्याय का संदेश आज भी बहुजन राजनीति को प्रभावित करते हैं।कांशीराम ने भारतीय लोकतंत्र में वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि संगठित प्रयास, वैचारिक स्पष्टता और निरंतर संघर्ष के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की राह बनाई जा सकती है। बहुजन समाज को एकजुट करने और सत्ता में उसकी भागीदारी सुनिश्चित करने का उनका सपना आज भी सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए प्रेरणा बना हुआ है।



बाबा साहब डॉ अम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम साहब के सपनों को साकार करने के लिए बहन मायावती जी ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है।जिस दिन बहुजन समाज पार्टी को राजनीतिक सत्ता की मास्टर चाबी हासिल हो जाएगी। बाबा साहब डॉ अम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम साहब का सपना जरूर पूरा होगा।आज पुण्यतिथि पर हम पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं के साथ बहन मायावती जी को पांचवीं बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प ले रहे हैं।
विश्व नाथ पाल,प्रदेश अध्यक्ष बसपा





पुण्यतिथि पर मान्यवर कांशीराम साहब को कोटि कोटि नमन, भावभीनी श्रद्धांजलि, मान्यवर कांशीराम साहब युगपुरुष हैं,वे भारतीय राजनीति के पर्याय हैं। कलुषित विचार और मानसिकता के कारण ही केन्द्र सरकार ने उन्हें अभी तक सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न नहीं दिया।-जितेन्द्र मिश्र,वरिष्ठ बसपा नेता, अमेठी