
पारदर्शी विकास न्यूज़ कानपुर। कानपुर के परेड ग्राउंड की ऐतिहासिक रामलीला ने 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं। वर्ष 1877 में अंग्रेजों के शासनकाल में शुरू हुई इस रामलीला की परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और भव्यता के साथ जारी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंचन में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और हनुमान जी के पात्रों के लिए 100 साल से अधिक पुराने चांदी के अस्त्र-शस्त्र, मुकुट और सिंहासन आज भी इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं, रथयात्रा में उपयोग होने वाली ऐतिहासिक वस्तुएं भी इस रामलीला की विरासत को खास बनाती हैं।परेड रामलीला में भगवान श्रीराम के धनुष-बाण से लेकर हनुमान जी की गदा तक ऐतिहासिक अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग किया जाता है। भगवान राम और लक्ष्मण के मुकुट, चांदी के सिंहासन तथा रथयात्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुएं भी वर्षों पुरानी हैं। इन धरोहरों को सुरक्षित रखने के लिए उनकी नियमित देखरेख और मरम्मत की जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक परंपरा से जुड़ी रह सकें।परेड रामलीला सोसाइटी के प्रधानमंत्री कमल किशोर अग्रवाल पिछले करीब 50 वर्षों से सोसाइटी से जुड़े हैं और 12 वर्षों से प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रामलीला में इस्तेमाल होने वाले कई अस्त्र-शस्त्र उनके सोसाइटी से जुड़ने से पहले से मौजूद हैं। इनमें से अनेक वस्तुएं 100 साल से अधिक पुरानी हैं। उन्होंने बताया कि इन शस्त्रों को इस तरह तैयार किया गया है कि मंचन के दौरान किसी को नुकसान न पहुंचे। इनकी सुरक्षा और रखरखाव का विशेष ध्यान रखा जाता है।परेड रामलीला की एक और खास पहचान मथुरा का चतुर्वेदी परिवार है, जो लगातार छह पीढ़ियों से रामलीला के पात्रों के माध्यम से भगवान श्रीराम की भक्ति परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। वहीं, व्यास महेश दत्त चतुर्वेदी को रामलीला के मंच पर चौपाइयों और दोहों का सस्वर गायन करते हुए 50 साल से अधिक समय हो चुका है। इस तरह परेड रामलीला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।