

पारदर्शी विकास ब्यूरो।
भारत को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए सहकारिता को मजबूत करना सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है। यह विचार उमाकांत शर्मा ने एक मंथन के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि देश में लगभग 9 लाख सहकारी समितियां हैं, जिनसे करीब 32 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। इतने बड़े स्तर पर लोगों की भागीदारी सहकारिता को देश की आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार बनाती है।उमाकांत शर्मा ने कहा कि आज विदेशी कंपनियां भारत को एक बड़े बाजार के रूप में इस्तेमाल कर अपने देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं। ऐसे में सहकारिता से जुड़े करोड़ों लोगों को संगठित कर स्वदेशी उत्पादन, स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और स्थानीय विकल्पों को व्यापक स्तर पर बढ़ावा दिया जा सकता है।उन्होंने कहा कि सहकारी समितियों से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन व्यापक स्तर पर होता है और बायोगैस उत्पादन के लिए गोबर जैसे कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है। यदि सहकारिता के माध्यम से गांवों में बड़े स्तर पर बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जाएं तो कम समय में ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।उमाकांत शर्मा ने कहा कि देश के पास सहकारिता के माध्यम से व्यापक संसाधन उपलब्ध हैं, लेकिन उनका अपेक्षित स्तर पर उपयोग नहीं हो पा रहा है। यदि सहकारिता से जुड़े करोड़ों लोग अपने स्तर पर बायोगैस और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को अपनाएं तो देश की आयात पर निर्भरता कम करने में बड़ी मदद मिल सकती है।उन्होंने कहा कि भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए सहकारिता एक व्यापक और प्रभावी विकल्प है। छोटे-छोटे प्रयास समाज में जागरूकता ला सकते हैं, लेकिन करोड़ों लोगों की सामूहिक भागीदारी से ही अपेक्षित बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।उन्होंने सभी लोगों से सहकारिता के माध्यम से सार्थक प्रयास करने की अपील करते हुए कहा कि सामूहिक भागीदारी से कम समय में व्यापक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं और देश को आर्थिक स्वावलंबन की दिशा में मजबूत बनाया जा सकता है।