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धार्मिक प्रथाओं पर कोर्ट में चुनौती बढ़ी तो समाज और धर्म पर असर पड़ सकता है: सुप्रीम कोर्ट

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PARDARSHI VIKASH NEWS सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और परंपराओं को लगातार अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इसका असर न सिर्फ धर्म पर बल्कि समाज की संरचना पर भी पड़ सकता है। नौ जजों की संविधान पीठ इस समय धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर विवाद और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े पुराने मामले शामिल हैं।सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर हर धार्मिक रीति-रिवाज को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो हजारों याचिकाएं दाखिल होंगी और इससे न्यायपालिका पर भारी दबाव पड़ेगा। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और धर्म से जुड़ी गहरी सामाजिक संरचना है, और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं जस्टिस एमएम सुंदरेश ने कहा कि बार-बार ऐसे विवाद उठने से धर्म और अदालत दोनों पर असर पड़ेगा और सामाजिक अस्थिरता की स्थिति बन सकती है।दूसरी ओर याचिकाकर्ता पक्ष ने दलील दी कि जो भी धार्मिक परंपराएं मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, उन पर संविधान के तहत सवाल उठाया जाना जरूरी है। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है और हर मामले की गहराई से जांच आवश्यक है।यह मामला खास तौर पर दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार की परंपरा और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा हुआ है, जिन पर पिछले कई वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लगातार बहस चल रही है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि पुराने फैसलों और लंबित याचिकाओं पर दोबारा विचार करते समय सावधानी बरतनी जरूरी है, ताकि न्यायिक स्थिरता बनी रहे और समाज में अनावश्यक टकराव न बढ़े।